Home धर्म आस्था वृन्दावन के 5 प्रसिद्ध मंदिर

वृन्दावन के 5 प्रसिद्ध मंदिर

एक समय वृन्दावन केवल एक वन मात्र था। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रज भूमि में कुल १२ वन थे। वृन्दावन उनमें से एक है। यमुना नदी के तीर स्थित इस वन में श्री कृष्ण ने गोपिकाओं के संग अनेक बाल लीलाएं रचाई हैं। यहीं चीर घाट पर स्नान के लिए आयी गोपियों के वस्त्र चुराकर वे वृक्ष पर चढ़ गए थे। यहीं समीप ही उन्होंने कालिया नाग का वध भी किया था।इसी वन में उन्होंने रास लीला रचाई थी। आपको विश्वास नहीं होगा किन्तु ऐसा माना जाता है की कृष्ण अब भी प्रत्येक रात्रि एक अन्य छोटे वन में गोपियों संग रास रचाते हैं।

वृन्दावन का पावन क्षेत्र मंदिरों से भरा हुआ है। इन सब के दर्शन करना तभी संभव है जब आप यहाँ निवास कर रहे हों। अधिकतर तीर्थयात्री उन्ही मंदिरों के दर्शन करते हैं जिनसे वे अथवा उनके गुरु संबंधित हों। इन के साथ वे कुछ लोकप्रिय अथवा प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन करते हैं।

श्री बाँके बिहारी मंदिर

श्री बाँके बिहारी मंदिर इस पावन नगरी का सर्वाधिक लोकप्रिय तथा इसी कारण सर्वाधिक भीड़भाड़ भरा मंदिर है। आप यहाँ किसी भी समय आयें, मंदिर में भक्तों व दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। मंदिर में स्थित बाँके बिहारी जी की मूर्ति स्वामी हरीदास को समीप स्थित निधिवन में प्राप्त हुई थी। १८ वीं. सदी में इसी मूर्ति के चारों ओर मंदिर की संरचना की गई। मंदिर के बाहर स्थित मार्ग पर स्वामीजी का स्वयं का मंदिर भी है। ऐसी मान्यता है कि इस मूर्ति के भीतर राधा एवं कृष्ण दोनों बसते हैं। इस मंदिर की एक अनोखी विशेषता है कि यह पूर्वान्ह ९ बजे के पश्चात ही खुलता है

गोविंद देव मंदिर

१६ वीं. सदी में जयपुर के राजा मान सिंह द्वारा निर्मित यह मंदिर कभी एक भव्य मंदिर रहा होगा। लाल बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित यह मंदिर एक समय सात तलों का मंदिर था। इसके ऊपरी ३ से ४ तलों को औरंगजेब ने ध्वस्त कर दिया था। वर्तमान में यह मंदिर शिखर रहित है। शिखर के बिना भी यह मंदिर अत्यंत विशाल प्रतीत होता है। अपने स्वर्णिम काल में यह अखंडित मंदिर कितना भव्य रहा होगा, आज हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं। गलियों में भ्रमण करते समय अपने लाल रंग के साथ यह मंदिर आसपास की दुकानों के समूह  में पृथक छवि प्रस्तुत करता है। १८ वीं. सदी में जब इस मंदिर पर आक्रमण किया गया था तब भगवान की प्रतिमा को जयपुर स्थानांतरित किया गया था।

श्री रंगनाथजी मंदिर

१९ वीं. सदी के मध्य काल में निर्मित यह मंदिर भारत भर के कृष्ण भक्तों के संगम का द्योतक है। चटक रंगों का ऊंचा गोपुरम आपको तुरंत तमिल नाडु का स्मरण करा देगा। यद्यपि गोपुरम पर स्थित झरोखे एवं अलंकृत मुंडेर स्थानीय वास्तुशिल्प की झलक दिखाते हैं तथापि मंदिर परिसर का अंतरंग आपको वस्तुतः दक्षिण भारत पहुँचा देता हैइस मंदिर में भी दक्षिण भारत के मंदिरों के समान रथ जात्रा का उत्सव मनाया जाता है। इस मंदिर के पुजारी भी तमिल नाडु के मंदिरों के पुजारियों के समान रूखा व्यवहार करते हैं।

श्री राधा वल्लभ मंदिर

इस मंदिर का निर्माण श्री राधावल्लभ संप्रदाय के संस्थापक गोस्वामी हरिवंश महाप्रभू ने करवाया था जिन्हे भगवान कृष्ण की बाँसुरी का अवतार माना जाता है। यह मंदिर मेरे अब तक के देखे सबसे जीवंत मंदिरों में से एक है। कुछ लोग संगीत वाद्य बजा रहे थे जिसकी तान पर भक्तगण नाच रहे थे तथा होली खेल रहे थे। गर्भगृह के भीतर मुरली बजाते कृष्ण की प्रतिमा है जबकि राधा की उपस्थति केवल उनके मुकुट द्वारा दर्शाई गई है।

श्री राधा रमण मंदिर

राधा रमण का शाब्दिक अर्थ है राधा को रमने वाला अर्थात राधा का मन मोहने वाला, जो कोई और नहीं, अपितु कृष्ण हैं। गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा निर्मित १६वीं. सदी का यह मंदिर अत्यंत मनभावन है। वे ७ शिलाओं अथवा शालिग्रामों के साथ यहाँ आए थे। शालिग्राम नेपाल के गण्डकी नदी में पाया जाने वाला एक पत्थर है जिसे विष्णु का स्वरूप माना जाता है। गोस्वामीजी उनकी नित्य पूजा अर्चना करते थे तथा रात्री के समय उन्हे सींक की टोकरी से ढँक देते थे। एक दिन प्रातः जब उन्होंने टोकरी उठाई, एक शालिग्राम पत्थर कृष्ण की मूर्ति में परिवर्तित हो गई थी। इस मंदिर में कृष्ण की उसी मूर्ति की पूजा की जाती है। चूंकि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी, इसे जीवंत अथवा जाग्रत मूर्ति माना जाता है।

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